गाजीपुर के ‘मालवीय’ बाबू राजेश्वर सिंह नहीं रहे

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गाजीपुर। बाबू राजेश्‍वर सिंह (96) अब नहीं रहे। वह गाजीपुर के मालवीय थे। पीजी कॉलेज, आदर्श इंटर कॉलेज सहित कई शिक्षण और समाजसेवी संस्‍थाओं के संस्‍थापक थे। उनका निधन मंगलवार की शाम करीब छह बजे बीएचयू अस्‍पताल में हुआ। यह खबर मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया। गाजीपुर में शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों सहित समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों के लिए भी यह खबर शोक में डालने वाली है। खबर सुनने के बाद गाजीपुर में उनके तिलकनगर स्थित आवास पर लोग पहुंचने लगे थे। बाबू राजेश्‍वर सिंह के परिवार के अनुसार बीते गुरुवार को उनका रक्‍तचाप अचानक बढ़ गया। पहले उन्‍हें गाजीपुर के हृदय रोग विशेषज्ञ आरबी राय के अस्‍पताल में दाखिल कराया गया। जहां आराम मिलने के बाद उनको छुट्टी दे दी गई लेकिन फिर स्थिति और बिगने लगी तब उनको वाराणसी ले जाया गया। वहां एक निजी अस्‍पताल के बाद बीएचयू अस्‍पताल में दाखिल कराया गया। इसी बीच उनके छोटे पुत्र और इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रदेश सरकार के अपर महाधिवक्‍ता अजीत सिंह ने बताया कि बाबूजी का पार्थिव शरीर गाजीपुर आवास पर लाया जा रहा है। दाह संस्‍कार गाजीपुर में ही तीन अप्रैल की शाम दो बजे होगा। बाबू राजेश्‍वर सिंह को कृतियों के चलते गाजीपुर का मदन मोहन मालवीय कहा जाता था। मूलत: गाजीपुर के सैदपुर तहसील के रामपुर गांव के रहने वाले बाबू राजेश्‍वर प्रसाद सिंह का जन्‍म सन् 1923 में हुआ था। दुर्योग था कि जब उनका जन्‍म हुआ तो गांव में प्‍लेग की महामारी फैली हुई थी और उसी दिन उनके सहोदर भाई की मौत हो गई थी। बड़े पुत्र के निधन से उनकी मां नवजात राजेश्‍वर को अस्‍वीकार कर दीं। नतीजा उनका लालन-पालन गांव के ही ब्राह्मण परिवार दिलीप पांडेय के घर हुआ। बाद में असमय मां-पिता का भी उनके सिर से साया उठ गया। महज 18-19 वर्ष की अवस्‍था में बाबू राजेश्‍वर सिंह पर अपने चार भाइयों की जिम्‍मेदारी भी आ गई। सन् 1945 में उनका विवाह सकलडीहा कोट (चंदौली) के जमींदार परिवार मुकुट बिहारी सिंह की पुत्री मगनेश्‍वरी सिंह से हुआ। बाबू राजेश्‍वर सिंह की माध्‍यमिक शिक्षा यूपी कॉलेज वाराणसी में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वह इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में चले गए। जहां उन्‍होंने कानून की डिग्री ली। इसके बाद वह वकालत करने के लिए गाजीपुर चले आए। उसी दौरान उन्‍हें डिग्री कॉलेज खोलने का विचार आया। उनका प्रयास शुरू हो गया। तत्‍कालीन कलक्‍टर कुशलपाल सिंह के सहयोग से गोराबाजार में 70-80 एकड़ भूखंड का अधिग्रहण हुआ। जहां आज पीजी कॉलेज स्‍थापित है। वैसे इस पीजी कॉलेज की शुरूआत आदर्श इंटर कॉलेज परिसर से ही हो गई थी। 15 जून 1957 को पीजी कॉलेज को मान्‍यता मिली। बाबू राजेश्‍वर सिंह का ही प्रयास रहा कि पीजी कॉलेज परिसर में कृषि विज्ञान केंद्र, स्‍टेडियम, प्रबंधन एवं टेक्निकल संस्‍थान (टेरी) स्‍थापित हुआ। इतना ही नहीं गाजीपुर में होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज की स्‍थापना में भी उनका कम योगदान नहीं है।बाबू राजेश्‍वर सिंह अपने पीछे पत्‍नी सहित तीन पुत्रों का भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। इनके सबसे छोटे पुत्र संजीव कुमार सिंह भारतीय प्रशासनिक सेवा के बिहार कॉडर के अधिकारी हैं, जबकि सबसे बड़े पुत्र अमिताभ सिंह दिल्‍ली में व्‍यवसाय करते हैं।

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