…तब सियासत की विरासत में अपना नाम दर्ज कराने में जुटे हैं राज ठाकुर

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गाजीपुर। वैसे देखा जाए तो गाजीपुर के लिए सियासत में विरासत का प्रचलन कोई नया नहीं रह गया है। आज कई ऐसे चेहरे हैं जो विरासत की सियासत संभाल रहे हैं। इसी कतार में और एक चेहरा लग गया है। नाम है राज ठाकुर। वह जिला सहकारी बैंक के पूर्व चेयरमैन अरुण सिंह के बेटे हैं। हालांकि विरासत की राजनीति करने वाले गाजीपुर के नेताओं में राज ठाकुर का मामला कुछ हट कर है। इनके पिता अरुण सिंह हत्या के एक मामले में नैनी जेल में निरुद्ध हैं। उनके सहयोगियों, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से मार्ग निर्देशन लेकर राज ठाकुर अपने पिता की सियासी विरासत को सहेजने, संवारने में लगे हैं।

कहते हैं वक्त सब कुछ सिखा देता है। राज ठाकुर भी अब सब सिखने लगे हैं। लोगों की जरूरत, भावनाओं को जानने लगे हैं। हालांकि पेशेवर सियासतदानों की तरह वह मौके पर अपने चेहरे पर नाटकीय भाव नहीं ला पाते हैं। बल्कि मौकों की नजाकत देख अंदर उमड़ रहीं संवेदनाएं उनके मासूम चेहरे पर साफ तिरती दिखने लगती हैं। इधर तीन दिन के अंदर वह कई मौके पर दिखे। इत्तेफाक रहा कि हर मौका गम का रहा और राज ठाकुर उसी अंदाज में पीड़ित पक्षों से मिले। उन्हें एहसास कराए कि पिता की नामौजूदगी में वह तन-मन से उनके साथ हैं। गुरुवार को वह नंदगंज थाने के हकीमपुर(सोनठी) पहुंचे थे। जहां बीटिया की शादी के ऐन दिन बाप रघुबर बिंद की मौत हुई थी।

फिर शक्रवार को राज ठाकुर शहर से सटे जैतपुरा पहुंचना नहीं भूले। वहां अनंतनाग में आतंकी हमले में शहीद सीआरपीएफ जवान महेश कुशवाहा के पिता गोरखनाथ से मिले। उनका ढांढस बंधाए। शहीद महेश पर गर्व जताए। उसके बाद वह मोहब्बलपुर के राम अवध बिंद के घर गए। वहां बताया गया कि राम अवध के बेटे रामप्यारे की सड़क हादसे में मौत की सूचना देने के बावजूद इलाकाई स्वजातीय विधायक डॉ.संगीता बलवंत को पीड़ित परिवार का हाल पूछने के लिए भी वक्त नहीं मिला। राज ठाकुर ने परिवार को भरोसा दिया कि अपने पिता की नामौजूदगी में वह उनके साथ हैं। उस मौके पर राज ठाकुर के साथ ज्ञानेंद्र सिंह प्रधान, ज्ञानेंद्र सिंह बबलू, राकेश कनौजिया, अविनाश प्रताप सिंह आदि थे। शनिवार को राज ठाकुर बिरनो तिराहे पर थे। वहां कारगील युद्ध में गाजीपुर के पहले शहीद कमलेश सिंह के शहादत दिवस पर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित किए। सियासत की विरासत की चर्चा पर राज ठाकुर मासूमियत के साथ लेकिन सधे अंदाज से कहते हैं-पिता की नामौजूदगी में उनका काम खासकर सामाजिक सरोकारों से जुड़े काम देखना हर बेटे का फर्ज होता है। मेरी पूरी कोशिश है कि अरुण सिंह के लौटने तक मैं उनकों चाहने वालों के सुख-दुख में जरूर मौजूद रहूंं।

मालूम हो कि गाजीपुर में सियासत की विरासत संभालने वालों की लंबी फेहरिस्त है। उनमें विधायक डॉ.वीरेंद्र यादव, पूर्व एमएलसी विजय यादव, राजेश कुशवाहा, भानु पांडेय, अब्बास अंसारी, मन्नू अंसारी वगैरह प्रमुख हैं। इसी तरह प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सिंह की भी दिली और पुरानी ख्वाहिस है कि बड़ा बेटा रितेश सिंह सियासत का हर गुर सिख ले।

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